तुलसी दास भक्ति भावना / tulsi das

Ranjay Kumar

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The devotion and spiritual sentiment of Tulsidas

पठित पदों के अधार पर तुलसी की भक्ति का परिचय दिजीए

गोस्वामी तुलसीदास, जिन्हें भक्तिकालीन रामाश्रथी काव्यधारा के श्रष्टा कहा जाता है, अपनी अनूठी कविता धारा के माध्यम से भारतीय साहित्य को एक नए दर्शन देने में सक्षम रहे हैं। उनका काव्य विश्वभर में आदर्शपूर्णता का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक भावनाएं, भक्ति और मानवता के मूल्यों का समाहित होता है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से जीवन की सभी पहलुओं को छूने का प्रयास किया और एक नए आदर्श की स्थापना की।

तुलसीदास ने दूगृदृष्टिलाघवी, दोहावली, बिनय पत्रिका और रामचरितमानस के माध्यम से अपनी भावनाओं को अद्वितीय ढंग से व्यक्त किया। उनका काव्य सर्वगुणपूर्णता का प्रतीक है, जिसमें सुंदरता, श्रद्धा, और सार्थकता सहित सभी आवश्यक गुण समाहित हैं। उनकी कविताएं आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में एक नए राह का प्रतिपादन करती हैं, जो आज भी हमें मार्गदर्शन करता है।

तुलसीदास के भक्तों के आश्रम से लेकर जनसामान्य के चौपाल तक, और ढोल-झाल से युक्त गायन मंडली से लेकर प्राचीन पंडितों की अनुसंधानशाला तक, उनकी कविता समृद्ध भारतीय सांस्कृतिक विरासत को सार्थकता से संजीवनी दे रही है। डॉ० जॉर्ज ग्रियर्सन ने तुलसीदास को बुद्ध के बाद के सभी लोकनायकों में श्रेष्ठ कहा है, जो उनकी श्रेष्ठता को और भी प्रमोट करता है।

इस सुंदरता और श्रेष्ठता की संगी

“समन्वय और समृद्धि: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के दृष्टिकोण”

इस सन्दर्भ में, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विवेचना की है कि एक समृद्ध समाज में लोकनायक वह होता है जो समन्वय का प्रतीक होता है। उनका कहना है कि भारतीय समाज में विभिन्न संस्कृतियाँ, आचारनिष्ठाएं, और जातियाँ हैं, लेकिन समन्वय उन सभी को एक समृद्ध सामाजिक गुणस्थान में मिला देता है। वे बुध्ददेव, मीता, और तुलसीदास के माध्यम से समन्वयकारी भावना को प्रस्तुत करते हैं, जिससे समाज को एकमुखी दिशा में प्रेरित किया जा सकता है। उन्होंने अपने काव्य में सगुण-निर्मुण, ज्ञान~मक्ति, शैव-वैध्याव, संस्कृत हिन्दी आदि के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक समृद्धि का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसी कारण उन्होंने राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम को अपने काव्य-नायक के रूप में चुना है ताकि लोग उससे प्रेरणा लें और समृद्ध समाज की दिशा में कार्य करें।

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तुलसीदास की समन्वयशीलता: रामचरितमानस के महाकाव्य में एक सूत्र

तुलसीदास ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी जगत को ‘कवितावली’ और ‘विनय-पत्रिका’ जैसे मुक्तक संग्रह और ‘रामचरितमानस’ जैसा महाकाव्य प्रदान किया। उनका समन्वयपूर्ण कवित्व एक सूत्र में पिरोने का प्रयास करता है, जो सभी के बीच एकता का संदेश लेकर आता है। तुलसीदास की प्रबंध-प्रियता और पटुता ने इसे मुख्य बना दिया है। उन्होंने विभिन्न छंदों और प्रचलित काव्य रूपों में अनेक प्रयोग किए, लेकिन उन्होंने ‘रामचरितमानस’ जैसे प्रबंथ से अपने कवित्व को चरम सार्थकता प्रदान कर दी।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार, उन दिनों के पण्डितों ने साबित किया कि उस काव्य युग में कोई ऐसी अद्वितीय पद्धति नहीं थी जिस पर उन्होंने अपनी शानदार छाप नहीं लगाई थी। छन्द-पद्धतियों में छप्पायें, कबीर के दोहे, सूरदास की मद, जायसी की दोहा, चौपाइयाँ, रीतिकारों के सवैया-कविता, रहीम के बरवै, गाँव चालों का सोहर, आदि जैसी विभिन्न छंद-पद्धतियाँ उस समय में प्रसिद्ध थीं, और उन्होंने इन सभी को अपनी अद्वितीय प्रतिमा के रूप में चित्रित किया। उनकी कल्पना और सृजनशीलता ने उन्हें एक सुप्रसिद्ध कवि बना दिया, जिनका योगदान हिन्दी साहित्य के इतिहास में अमूल्य है।

“यह तो शैली या पद्धति की बात हुई, पर तुलसी के काव्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी लोक चेतना है। संक्रांति काल में नाना आडंबरों और ऊपापोहों की उत्पत्ति और कठिन गरीबी तथा उपेक्षा के माहौल में, उनका संवेदनशील कवित्व राम जैसा चरित्र पैदा करने में सक्षम था। वे एकांगी रह ही नहीं सकते थे। उन्होंने जीवन को पूर्णता में ग्रहण करने और उसे व्यक्त करने की कोशिश की, जिसमें उन्हें अद्वितीय सफलता मिली। उनके काव्य की मूल भावभूमि को समझने के लिए, रामचरितमानस के मंगलाचरण को देखना पर्याप्त है।”

“रामचरितमानस के प्रमुख पात्र राम हैं। तुलसीदास राम के अनन्य भक्त हैं और ‘मानस’ के मंगलाचरण में गणपति की वंदना के बाद सबसे पहले माँ वाणी और भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इसके पूर्व, एक ही श्लोक में गणेश और सरस्वती की पूजा का समर्पण होता है। आगे जाकर, संतों के विशेष चरणों की वंदना है, जिसमें असंतों के भी पादों की पूजा की गई है।”

frequently asked questions

तुलसी दास का जन्म कब हुआ था?
तुलसी दास का जन्म 16वीं सदी में हुआ था, लगभग 1532 ईसा पूर्व।

तुलसी दास का असली नाम क्या था?
तुलसी दास का असली नाम रमेश था, जो बाद में उन्होंने संत तुलसीदास के रूप में अपनाया।

तुलसी दास ने किस ग्रंथ की रचना की थी?
तुलसी दास ने महाकाव्य “रामचरितमानस” की रचना की थी, जिसमें वह भक्ति और भाग्य के महत्वपूर्ण सिद्धांतों को बयान करते हैं।

तुलसी दास के द्वारा रचित अन्य काव्य कौन-कौन से हैं?
तुलसी दास ने “कवितावली” और “विनय-पत्रिका” जैसे मुक्तक संग्रह और विभिन्न भजन रचे हैं।

तुलसी दास की भक्ति भावना में कौन-कौन से मुख्य सिद्धांत हैं?
तुलसी दास की भक्ति भावना में प्रारंभ से ही प्रभु राम के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रेम के महत्व को महत्वपूर्ण सिद्धांत माना गया है।

conclusion

तुलसी दास की भक्ति भावना एक नये सत्य और आध्यात्मिकता की ऊँचाइयों को छूने का एक अद्वितीय पथ प्रस्तुत करती है। उनकी रचनाओं में समाहित भक्ति, प्रेम, और समर्पण की भावना आज भी हमारे मन और आत्मा को प्रेरित करती हैं। रामचरितमानस, कवितावली, और विनय-पत्रिका जैसी उनकी रचनाएं हमें धार्मिकता और मानवता के महत्वपूर्ण सिद्धांतों से परिचित कराती हैं। तुलसी दास के भक्ति साहित्य का एक महत्वपूर्ण पहलु है कि उन्होंने यह दिखाया कि सच्चे भक्ति और प्रेम का माध्यम ही सबसे उच्च और पवित्र होता है। तुलसी दास का काव्य हमें धार्मिकता, नैतिकता, और सामाजिक समर्थन की ओर प्रेरित करता है और हमें एक सकारात्मक मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। इसके साथ ही, उनकी भक्ति भावना ने हमें बताया है कि सच्चा धर्म और भक्ति जीवन को कैसे सुंदर और अर्थपूर्ण बना सकते हैं। तुलसी दास का संदेश आज भी हमें मार्गदर्शन करता है और हमें एक सकारात्मक और सत्यव्रत जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है।

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